क्या आम आदमी पार्टी ख़त्म होने के कगार पर है, लगता है अगले 5 वर्ष में AAP इतिहास का हिस्सा बन जाएगी:

याद कीजिये 2012-13 जब देश में अन्ना हज़ारे का तूफ़ान उठा था, तब केंद्र की मनमोहन सरकार और दिल्ली राज्य की शीला सरकार दोनों के हाथ पैर फूल गए थे. लेकिन उस तूफ़ान के पीछे षणयंत्र के ताने-बाने भी बुने जा रहे थे. वह षणयंत्र था पहले दिल्ली की सत्ता और फिर केंद्र की सत्ता पर काबिज़ होना और दिमाग था NGO का धंधा चलाने वाले एक गैंग का जिसके सरगना थे अरविन्द केजरीवाल. लोगों ने तो उनको इस देश का भाग्य नियंता भी मान लिया था, लोगो को लगता था कि भविष्य के प्रधानमंत्री पद के लिए यही व्यक्ति सबसे उपयुक्त है, और भ्रष्टाचार के इस भयानक दैत्य से अगर कोई मुक्तिदाता आजाद करा सकता है तो यही मफलर बांधे गांधी जी के नए अवतार श्रीमान अरविन्द केजरीवाल.

किस्मत से आम आदमी पार्टी को चुनाव निशान भी मिला ‘झाड़ू’, दावा किया गया कि, अब इससे वो इस देश के भ्रष्टाचार की गन्दगी साफ़ करेंगे, कालांतर में हुआ इसका बिल्कुल उल्टा, पार्टी के जितने बड़े नामी गिरामी चेहरे थे जिनसे केजरीवाल के नेतृत्व को खतरा था उनको षणयंत्र रच रच कर पार्टी से इसी झाड़ू से बेदखल कर दिया गया, जिस झाड़ू से गन्दगी बाहर करने का दावा किया गया था उससे ही गन्दगी पार्टी में जमा कर ली गयी, कई घटनाओं से ऐसा लगने लगा कि, केजरीवाल राष्ट्रविरोधियों के पक्ष में ज्यादा हैं और देश के साथ कम, उनकी हिन्दू विरोधी की छवि तो पहले ही बन चुकी है.

केजरीवाल जिन सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, रोबर्ट वाड्रा, शीला दीक्षित, चिदंबरम, मुलायम सिंह, लालू यादव, शरद पंवार को उनके भ्रष्टाचार के लिए पानी पी पी कर कोसा करते थे और दावा करते थे कि इन सबको वो नेस्तनाबूत करके रहेंगे, आज उन्ही के चरणों में चारण बन कर दंडवत हैं, पंजाब की आम आदमी पार्टी केंद्रीय आम आदमी पार्टी से पहले ही अलग हो चुकी है और बाकी प्रदेशों में सिर्फ एक मजाक की तरह हैं. केजरीवाल अब खुल कर भ्रष्टाचारियों और साम्प्रदायिक लोगों के साथ नजर आने लगे हैं, उनके तब के भ्रष्टाचार के खलनायक आज उनके नायक बन गए हैं.

लेकिन केजरीवाल भूल गये, देश की जनता सब देख रही है, केजरीवाल अब खुद धीरे धीरे नायक और खलनायक की लक्ष्मणरेखा को पार करके खलनायक सरीखे दिखने लगे है, सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद उनके बयानों से उनका घिनौना और सत्ता लोलुप चेहरा लोगों के सामने आ गया है. कांग्रेस के आगे सत्ता के लिए नतमस्तक होकर गिड़गिड़ाने के कारण उनकी रही सही साख भी ख़त्म हो चुकी है, पार्टी के कार्यकर्ता, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले देशप्रेमी लोग ठगे हुए महसूस कर रहे हैं. उनकी सनक और घमंड उनको खुद के एकमात्र कालजयी और राष्ट्रनिर्माता होने का भरम पैदा करता है, पर वास्तव में अब उनको कोई गंभीर नेता नहीं मानता है. जनता उनको एक राजनीतिक नचनिया से ज्यादा अहमियत नहीं देती जो पैसे और सत्ता के लिए कभी भी ठुमका लगा सकती है.

केजरीवाल खुद भी सत्ता से बेदखली की आहट से बैचेन है, पर सत्ता और रसूख की उनकी हवस उनको राजनीतिक परिदृश्य में बने रहने के लिए उनको किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर कर रही, और रही सिद्धांत की बात, वो तो न पहले थे और न आज, सत्ता के लिए वो राजनीतिक नाटक के एक फ्लॉप नेता की तरह हाथ पैर पटक रहे हैं, पर पार्टी धीरे धीरे कमजोर हो रही है. बड़े नेताओ का धीरे धीरे पार्टी छोड़ कर जाना और इस्तीफ़ा देना यही दर्शाता है कि सपनों की इमारत अब दरक रही हैं, लगता तो यही है आगामी कुछ वर्षों में आम आदमी पार्टी इतिहास का हिस्सा बन जाएगी.

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